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अध्ययन क्षेत्र: विकास खंड बमोरी, जिला गुना (मध्य प्रदेश)

बमोरी अंचल का असाइनमेंट सिलेक्ट करें
बाल-श्रमिकों की स्थिति (बमोरी)
समाज कार्य अभ्यास के क्षेत्र

असाइनमेंट 10: बमोरी विकास खंड के होटलों, ढाबों एवं दुकानों में कार्यरत बाल-श्रमिकों की स्थिति का प्रत्यक्ष अवलोकन प्रतिवेदन

1. प्रस्तावना

बाल श्रम समाज के माथे पर एक गंभीर कलंक है जो बच्चों के बचपन, उनकी शिक्षा और भविष्य को छीन लेता है। 'बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम' के कड़े प्रावधानों के बावजूद, ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में यह समस्या आम है। गुना जिले के बमोरी विकास खंड के मुख्य बाजार, बस स्टैंड और फतेहगढ़ रोड स्थित विभिन्न चाय की दुकानों, ढाबों, किराना दुकानों और ऑटो-गैरेज पर कार्यरत 10 बाल-श्रमिकों की स्थिति का गैर-सहभागी अवलोकन (Non-Participant Observation) कर यह तथ्यात्मक रिपोर्ट तैयार की गई है।

2. अवलोकन का क्षेत्र एवं बाल-श्रमिकों की पृष्ठभूमि

अध्ययन के दौरान देखे गए 10 बच्चों की आयु 9 से 13 वर्ष के बीच पाई गई। इनमें से 7 बच्चे सहरिया जनजाति के और 3 अन्य अत्यंत निर्धन परिवारों से थे। पूछताछ करने पर ज्ञात हुआ कि इनमें से 3 बच्चों के पिता का देहांत हो चुका है और 4 बच्चों के पिता अत्यधिक शराब पीने के कारण काम नहीं करते। परिवार का पेट पालने के लिए इन मासूमों को श्रम के बाजार में धकेल दिया गया है।

3. अमानवीय कार्य-परिस्थितियों का विश्लेषणात्मक ब्यौरा

क. अत्यधिक लंबे कार्य के घंटे

बमोरी के इन होटलों और ढाबों पर बच्चों से सुबह 6 बजे से लेकर रात 9 बजे तक (लगभग 14-15 घंटे) लगातार काम लिया जाता है। उन्हें दोपहर में विश्राम का कोई निर्धारित समय नहीं दिया जाता।

ख. कार्य की जोखिम पूर्ण प्रकृति

चाय की दुकानों पर बच्चे उबलती हुई चाय और गर्म भट्ठियों के पास खड़े रहते हैं, जूठे बर्तन धोते हैं और भारी गैस सिलेंडर या पानी की केन उठाते हैं। ऑटो-गैरेज पर काम करने वाले बच्चे खतरनाक रसायनों, ग्रीस और पेट्रोल के संपर्क में रहते हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य को गंभीर खतरा रहता है।

ग. घोर आर्थिक शोषण एवं दुर्व्यवहार

इतने कठोर श्रम के बदले इन बच्चों को मात्र 50 से 100 रुपये प्रतिदिन या केवल दो वक्त का भोजन और चाय दी जाती है। कई मामलों में यह अल्प मजदूरी भी बच्चों को न देकर सीधे उनके माता-पिता को दे दी जाती है। काम के दौरान जरा सी भी गलती होने पर (जैसे गिलास टूट जाना) दुकान मालिकों द्वारा बच्चों को भद्दी गालियाँ दी जाती हैं और शारीरिक मारपीट (थप्पड़ मारना) की जाती है। इन बच्चों के चेहरों पर भय, कुपोषण और बचपन छिन जाने की उदासी स्पष्ट देखी जा सकती है।

4. बमोरी क्षेत्र में बाल श्रम के उत्तरदायी मुख्य कारण

  1. पारिवारिक विपन्नता एवं भुखमरी: सहरिया और गरीब परिवारों में आजीविका के स्थायी साधनों का अभाव बच्चों को काम करने के लिए विवश करता है।
  2. सस्ते और आज्ञाकारी श्रम की चाहत: दुकानदारों को वयस्क मजदूरों को 300-400 रुपये देने पड़ते हैं, जबकि बच्चे 60-70 रुपये में 15 घंटे काम करते हैं और वे दुर्व्यवहार का विरोध भी नहीं कर पाते।
  3. प्रशासनिक उदासीनता: स्थानीय स्तर पर श्रम विभाग या बाल कल्याण समितियों द्वारा नियमित निरीक्षण और रेस्क्यू (Rescue) अभियानों का अभाव।

5. समाज कार्यकर्ता के रूप में सुधारात्मक हस्तक्षेप

इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए चाइल्डलाइन (1098) और स्थानीय प्रशासन के सहयोग से इन बच्चों को तुरंत मुक्त कराया जाना चाहिए। मुक्त कराए गए बच्चों का नामांकन 'राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना' (NCLP) के विशेष विद्यालयों या कस्तूरबा/एकलव्य आवासीय विद्यालयों में कराना आवश्यक है। साथ ही, इन बच्चों के माता-पिता को आजीविका की सरकारी योजनाओं से जोड़कर उनका स्थायी आर्थिक पुनर्वास किया जाना चाहिए।

6. निष्कर्ष

बाल श्रम बमोरी के भावी मानव संसाधन का विनाश कर रहा है। केवल कानून बना देने से यह समस्या हल नहीं होगी, इसके लिए स्थानीय समाज को संवेदनशील होना पड़ेगा। जब तक हम गरीब के बच्चे को भी शिक्षा का समान अवसर नहीं देंगे, तब तक विकास खंड बमोरी का वास्तविक उत्थान संभव नहीं है।