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अध्ययन क्षेत्र: विकास खंड बमोरी, जिला गुना (मध्य प्रदेश)

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75 वर्षों में ग्रामीण परिवर्तन (बमोरी)
समाजकारीय शोध एवं सांख्यिकी

असाइनमेंट 9: बमोरी अंचल के वयोवृद्ध नागरिक के साक्षात्कार पर आधारित आजादी के 75 वर्षों में हुए ग्रामीण परिवर्तनों का ऐतिहासिक अध्ययन

1. प्रस्तावना एवं अध्ययन विधि

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात पिछले 75-80 वर्षों में भारतीय ग्रामों ने युगांतरकारी परिवर्तनों को देखा है। मध्य प्रदेश के गुना जिले के दूरस्थ अंचल बमोरी विकास खंड में हुए बदलावों का जीवंत इतिहास जानने के लिए सामाजिक शोध की 'मौखिक इतिहास विधि' (Oral History Method) का प्रयोग किया गया। इसके तहत ग्राम बमोरी के 84 वर्षीय वयोवृद्ध नागरिक एवं सेवानिवृत्त शिक्षक श्री ग्यारसीराम किरार जी से सघन वैयक्तिक साक्षात्कार किया गया। उनके संस्मरणों के आधार पर बमोरी अंचल के सामाजिक, आर्थिक, जनांकिकीय और सांस्कृतिक आयामों में हुए परिवर्तनों का क्रमबद्ध वर्णन नीचे प्रस्तुत है।

2. उत्तरदाता का परिचय एवं ऐतिहासिक संदर्भ

श्री ग्यारसीराम जी का जन्म 1942 में हुआ था। उन्होंने बमोरी क्षेत्र में ग्वालियर रियासत (सिंधिया शासन) का अंतिम दौर, जमींदारी प्रथा का उन्मूलन, डाकुओं/दस्यु समस्या का समय और वर्तमान डिजिटल युग सब अपनी आँखों से देखा है।

3. विभिन्न आयामों में हुए ऐतिहासिक परिवर्तन

क. सामाजिक आयाम (Social Dimensions)

बुजुर्ग के अनुसार सामाजिक संरचना में बुनियादी बदलाव आए हैं:

  • जाति व्यवस्था एवं छुआछूत: "आजादी के समय हमारे क्षेत्र में कठोर जातिगत नियम थे। सवर्णों के कुओं से सहरिया और दलित वर्ग के लोग पानी नहीं भर सकते थे। आज संविधान और शिक्षा के प्रभाव से यह भेदभाव लगभग समाप्त है। गाँव के सभी बच्चे एक ही स्कूल में साथ बैठकर मध्याह्न भोजन करते हैं।"
  • पारिवारिक विघटन: पहले संयुक्त परिवारों का चलन था। कृषि कार्य सामूहिक रूप से होते थे। आज व्यक्तिवाद के कारण एकल परिवारों की बाढ़ आ गई है, जिससे वृद्धों की देखभाल की समस्या उत्पन्न हुई है।

ख. आर्थिक एवं कृषि आयाम (Economic Dimensions)

  • कृषि का आधुनिकीकरण: "1960-70 के दशक तक बमोरी में केवल देसी बीज और बैलों से खेती होती थी। पैदावार केवल पेट भरने लायक थी। आज घर-घर में ट्रैक्टर हैं, रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग हो रहा है। पक्की सड़कें बनने से किसान अपनी फसल सीधे गुना मंडी में बेच रहे हैं।"
  • वस्तु-विनिमय का अंत: पहले गाँव में 'जजमानी व्यवस्था' थी। नाई, धोबी, बढ़ई को साल भर के काम के बदले फसल कटाई पर अनाज (दावँ) दिया जाता था। आज नकद और मोबाइल पेमेंट (UPI) का युग है।

ग. जनांकिकीय एवं भौतिक आयाम (Demographic & Infrastructure)

बमोरी के भौतिक स्वरूप में हुए परिवर्तन सर्वाधिक विस्मयकारी हैं:

  • आवास एवं जनसंख्या: 1950 में बमोरी एक छोटा सा कस्बा था जहाँ गिने-चुने कच्चे और घास-फूस के मकान थे। आज यह एक बड़ा विकास खंड मुख्यालय है जहाँ आरसीसी (पक्के) मकानों की बहुलता है।
  • सड़क, बिजली और स्वास्थ्य: "हमारे समय में बमोरी से गुना जाने के लिए पक्की सड़क नहीं थी, बैलगाड़ी से पूरा दिन लगता था। बरसात में पार्वती और अन्य नदियाँ उफान पर होने से अंचल हफ्तों तक कटा रहता था। आज चमचमाती सड़कें हैं, पुल बन गए हैं और गाँव में 24 घंटे बिजली है। पहले हैजा फैलने पर गाँव खाली हो जाते थे, आज सरकारी अस्पतालों से जनहानि रुकी है।"

घ. सांस्कृतिक आयाम (Cultural Dimensions)

सांस्कृतिक स्तर पर श्री ग्यारसीराम जी के स्वर में गहरी चिंता दिखाई दी: "पहले गाँव की चौपालों पर रामायण पाठ, आल्हा गायन और फाग के गीत गूँजते थे, जिससे आपसी प्रेम बना रहता था। आज मोबाइल फोन और टीवी ने चौपालें सूनी कर दी हैं। पारंपरिक वेशभूषा (धोती-पगड़ी) लुप्त हो गई है और स्थानीय बुंदेली/सहरिया संस्कृति पर आधुनिकता हावी है।"

4. निष्कर्ष

साक्षात्कार से यह स्पष्ट होता है कि आजादी के 75 वर्षों में बमोरी अंचल ने अज्ञानता, शोषण और अभावों से निकलकर भौतिक विकास की लंबी छलांग लगाई है। हालांकि, इस विकास की कीमत हमें अपने पारंपरिक सामुदायिक सौहार्द और सांस्कृतिक धरोहरों के क्षरण के रूप में चुकानी पड़ी है। विकास और परंपरा के बीच संतुलन बनाना आज के ग्रामीण समाज की महती आवश्यकता है।