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अध्ययन क्षेत्र: विकास खंड बमोरी, जिला गुना (मध्य प्रदेश)

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स्कूल के किशोर बच्चों का अध्ययन (बमोरी)
समाजकारीय व्यावहारिक कार्य (समूह एवं संस्थाएं)

असाइनमेंट 1: शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय, बमोरी के किशोर बच्चों (10-16 वर्ष) के समूह का अध्ययन प्रतिवेदन

1. क्षेत्र एवं संदर्भ की प्रस्तावना

किशोरावस्था (10 से 16 वर्ष) मानव जीवन के विकास की सबसे संवेदनशील अवस्था होती है। मध्य प्रदेश के गुना जिले का बमोरी विकास खंड एक आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है, जहाँ मुख्य रूप से 'सहरिया' (विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह - PVTG) और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग निवास करते हैं। इस क्षेत्र के किशोरों का सामाजिक-आर्थिक और मनोवैज्ञानिक परिवेश शहरी क्षेत्रों से अत्यंत भिन्न है। स्थानीय स्तर पर समूह गतिकी (Group Dynamics) और किशोरों की समस्याओं को समझने के उद्देश्य से शासकीय उत्कृष्ट उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, बमोरी के 10 से 16 वर्ष के 15 विद्यार्थियों (8 छात्र एवं 7 छात्राएं) के एक समूह का सघन व्यावहारिक अध्ययन किया गया।

2. समूह की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि

अध्ययन के लिए चयनित समूह के 60% बच्चे सहरिया जनजाति और 40% कृषक/मजदूर परिवारों से आते हैं। अधिकांश बच्चों के माता-पिता या तो लघु सीमांत किसान हैं या मौसमी मजदूरी के लिए कोटा (राजस्थान) और गुना शहर की ओर पलायन करते हैं। पारिवारिक आय सीमित होने के कारण इन बच्चों के पास अध्ययन के संसाधनों का अभाव रहता है। अध्ययन हेतु वैयक्तिक साक्षात्कार, फोकस समूह चर्चा (FGD) और सहभागी अवलोकन विधियों का प्रयोग किया गया।

3. व्यवहार एवं समूह गतिकी का विश्लेषण

अवलोकन के दौरान बमोरी क्षेत्र के इन किशोरों में निम्नलिखित प्रवृत्तियाँ देखी गईं:

  • नेतृत्व एवं सामूहिकता: समूह में ग्रामीण परिवेश के खेलों (जैसे- खो-खो, कबड्डी) के दौरान स्वाभाविक नेतृत्व क्षमता उभर कर सामने आई। सहरिया समुदाय के बच्चों में शुरुआत में झिझक देखी गई, किंतु समूह गतिविधियों में वे अत्यंत सक्रिय रहे।
  • सहपाठी प्रभाव (Peer Influence): 14-16 वर्ष के किशोरों में अपने समूह के प्रति अत्यधिक निष्ठा पाई गई। पारिवारिक समस्याओं के बावजूद वे अपने मित्रों के साथ समय बिताना और स्थानीय मेलों/हाट-बाजारों में जाना पसंद करते हैं।
  • शैक्षिक एवं भाषाई स्थिति: स्थानीय बुंदेली और सहरिया बोली का प्रभाव उनके संवाद में स्पष्ट है। मानक हिंदी बोलने में कुछ छात्रों को संकोच होता है।

4. बमोरी के किशोरों की प्रमुख पहचानी गई समस्याएँ

  1. पोषण एवं स्वास्थ्य का स्तर: बमोरी ब्लॉक में कुपोषण एक गंभीर मुद्दा है। समूह के कई किशोरों (विशेषकर बालिकाओं) में हीमोग्लोबिन की कमी (एनीमिया) और शारीरिक विकास की धीमी गति पाई गई।
  2. माता-पिता का मौसमी पलायन: कटाई के मौसम में माता-पिता के मजदूरी हेतु बाहर जाने के कारण घर और छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी इन किशोरों पर आ जाती है, जिससे 15-16 वर्ष की आयु में ड्रॉपआउट का खतरा बढ़ जाता है।
  3. कैरियर मार्गदर्शन का पूर्ण अभाव: 10वीं कक्षा के बाद क्या विषय चुनें या भविष्य में आजीविका के क्या साधन होंगे, इस पर बच्चों के पास कोई जानकारी नहीं है। वे केवल पारंपरिक खेती या मजदूरी को ही विकल्प मानते हैं।
  4. बाल विवाह की सामाजिक परंपरा: ग्रामीण अंचलों में आज भी 16 वर्ष की आयु पार करते ही बालिकाओं के विवाह की चर्चाएं शुरू हो जाती हैं, जिससे उनका मानसिक तनाव बढ़ता है।

5. समाज कार्यकर्ता के रूप में हस्तक्षेप एवं सुझाव

बमोरी के इन किशोरों के सर्वांगीण विकास के लिए विद्यालय स्तर पर 'जीवन कौशल शिक्षा' (Life Skills Education) और नियमित स्वास्थ्य शिविरों के आयोजन की आवश्यकता है। स्थानीय समुदाय और अभिभावकों के साथ बैठक कर उन्हें बालिकाओं की उच्च शिक्षा और पोषण के प्रति जागरूक करना अत्यंत आवश्यक है। सहरिया विकास अभिकरण के माध्यम से इन बच्चों के लिए विशेष व्यावसायिक प्रशिक्षण (Vocational Training) शुरू किए जाने चाहिए।

6. निष्कर्ष

बमोरी विकास खंड के किशोर असीम संभावनाओं और आंतरिक ऊर्जा से परिपूर्ण हैं। कठिन भौगोलिक और आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद उनमें सीखने की ललक है। एक समाज कार्यकर्ता के रूप में इस प्रतिवेदन ने मुझे ग्रामीण और जनजातीय परिवेश में समूह कार्य के व्यावहारिक सिद्धांतों को लागू करने का अनमोल अनुभव प्रदान किया।