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अध्ययन क्षेत्र: विकास खंड बमोरी, जिला गुना (मध्य प्रदेश)

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लैंगिक भेदभाव एवं समाधान (बमोरी)
वैकल्पिक विषय - महिला एवं बाल विकास

असाइनमेंट 4: बमोरी क्षेत्र में व्याप्त लैंगिक भेदभाव के व्यावहारिक उदाहरण एवं समाधान के उपाय

1. प्रस्तावना

लैंगिक भेदभाव का अर्थ है जैविक लिंग के आधार पर सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक स्तर पर अवसरों एवं अधिकारों से वंचित करना। गुना जिले के बमोरी विकास खंड के ग्रामीण और पारंपरिक समाज में पितृसत्तात्मक मूल्य आज भी गहरे तक व्याप्त हैं। यद्यपि जनजातीय समाजों (जैसे सहरिया) में महिलाओं को कुछ सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त होती है, किंतु समग्र ग्रामीण परिवेश का सूक्ष्म अवलोकन करने पर बालिकाओं और महिलाओं के साथ कदम-कदम पर होने वाले भेदभाव के प्रत्यक्ष उदाहरण सामने आते हैं।

2. बमोरी क्षेत्र में देखे गए लैंगिक भेदभाव के वास्तविक उदाहरण

क. शिक्षा के अवसरों में पक्षपात

बमोरी के ग्रामीण परिवारों में यह आम प्रवृत्ति है कि यदि परिवार के पास सीमित धन है, तो बेटे का दाखिला गुना शहर के किसी प्राइवेट स्कूल में कराया जाता है या उसे कमरे किराए पर लेकर पढ़ने भेजा जाता है। वहीं, बेटी को गाँव के ही शासकीय स्कूल में भेजा जाता है और 8वीं या 10वीं के बाद सुरक्षा और 'पराया धन' की मानसिकता के कारण उसकी पढ़ाई बंद करा दी जाती है।

ख. पोषण एवं स्वास्थ्य देखभाल में असमानता

क्षेत्र में कुपोषण का शिकार होने वाले बच्चों में बालिकाओं का प्रतिशत बालकों से अधिक है। घर में दूध, फल या अच्छा भोजन पहले घर के पुरुषों और लड़कों को परोसा जाता है। बीमार होने पर लड़कों को तुरंत निजी अस्पताल ले जाया जाता है, जबकि बालिकाओं के मामले में घरेलू उपचार या झाड़-फूँक का सहारा लिया जाता है। यही कारण है कि स्थानीय महिलाओं में रक्ताल्पता (Anemia) अत्यधिक है।

ग. बाल विवाह और कम उम्र में मातृत्व

बमोरी के कई अंदरूनी गाँवों (जैसे- फतेहगढ़, बिसोनिया अंचल) में आज भी 'आखातीज' (अक्षय तृतीया) के अवसर पर या सामाजिक सम्मेलनों में बालिकाओं का कम उम्र में विवाह कर दिया जाता है। 18 वर्ष से पूर्व ही मातृत्व का बोझ उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट कर देता है।

घ. आर्थिक निर्णयों में शून्यता

महिलाएं खेतों में बुआई से लेकर कटाई तक पुरुषों के बराबर या उससे अधिक श्रम करती हैं। सहरिया महिलाएं वनों से महुआ और जलाऊ लकड़ी बीनकर लाती हैं। किंतु फसल या वनोपज बिकने के बाद प्राप्त धन पर पूरा नियंत्रण पुरुष का होता है। संपत्ति या जमीन के पट्टे महिलाओं के नाम पर होने के मामले नगण्य हैं।

स्थानीय संदर्भ: बमोरी क्षेत्र में नशाखोरी (कच्ची शराब का सेवन) लैंगिक असमानता और घरेलू प्रताड़ना को और अधिक बढ़ावा देती है। शराबी पतियों द्वारा पत्नियों की मजदूरी के पैसे छीन लेना एक आम सामाजिक पीड़ा है।

3. बमोरी क्षेत्र में लैंगिक भेदभाव दूर करने के ठोस उपाय

  1. 'लाड़ली लक्ष्मी' और 'लाड़ली बहना' योजनाओं का प्रभावी लिंकेज: राज्य सरकार की इन महत्वाकांक्षी योजनाओं का लाभ बालिकाओं के शाला में बने रहने (Retention) की शर्त के साथ सख्ती से जोड़ा जाए।
  2. सघन जन-जागरूकता अभियान: स्थानीय लोक माध्यमों, नुक्कड़ नाटकों और 'सहरिया विकास समितियों' के माध्यम से बेटा-बेटी समानता का संदेश जन-जन तक पहुँचाया जाए।
  3. स्वयं सहायता समूहों (SHGs) का विस्तार: 'आजीविका मिशन' के तहत बमोरी की महिलाओं को संगठित कर उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना सबसे सशक्त उपाय है। जब महिला कमाती है, तो परिवार में उसकी निर्णय क्षमता स्वतः बढ़ जाती है।
  4. कानून का सख्त अमल: बाल विवाह रोकने हेतु ग्राम पंचायत स्तर पर सरपंच और सचिव को सीधे उत्तरदायी बनाया जाए। 'वन स्टॉप सेंटर' और महिला हेल्पलाइन (181) का व्यापक प्रचार बमोरी के हाट-बाजारों में किया जाए।

4. निष्कर्ष

लैंगिक भेदभाव बमोरी के सामाजिक और आर्थिक विकास में एक बड़ा अवरोध है। समाज के दोनों पक्षों को समान अवसर दिए बिना एक सशक्त और स्वस्थ अंचल की परिकल्पना नहीं की जा सकती। स्थानीय समुदाय के दृष्टिकोण में परिवर्तन ही इसका स्थायी समाधान है।