1. प्रस्तावना
समेकित बाल विकास सेवा (ICDS) के तहत संचालित आंगनबाड़ी केंद्र ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों के प्रारंभिक शारीरिक और मानसिक विकास की रीढ़ हैं। मध्य प्रदेश के गुना जिले के बमोरी विकास खंड में, जहाँ कुपोषण और शिशु मृत्यु दर ऐतिहासिक रूप से एक संवेदनशील मुद्दा रही है, इन केंद्रों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। 3 से 6 वर्ष की आयु के 20 बच्चों के समूह का अध्ययन करने हेतु बमोरी परियोजना के अंतर्गत एक स्थानीय आंगनबाड़ी केंद्र का सघन भ्रमण एवं अवलोकन किया गया।
2. आंगनबाड़ी केंद्र की भौतिक एवं जनसांख्यिकीय स्थिति
चयनित आंगनबाड़ी केंद्र एक पक्के शासकीय भवन में संचालित है। केंद्र में कुल 28 बच्चे पंजीकृत हैं, जिनमें 18 सहरिया जनजाति और 10 अन्य वर्गों से हैं। अध्ययन के दिन 20 बच्चे उपस्थित थे। केंद्र में एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और एक सहायिका नियुक्त हैं। भवन में बच्चों के अनुकूल पेंटिंग और कुछ खिलौने उपलब्ध पाए गए, किंतु पेयजल के लिए हैंडपंप पर निर्भरता दिखी।
3. अध्ययन के प्रमुख क्षेत्र एवं तथ्यात्मक विश्लेषण
क. पोषण एवं स्वास्थ्य निगरानी (Health & Nutrition)
बमोरी क्षेत्र के संदर्भ में बच्चों का पोषण स्तर सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयाम है:
- पूरक पोषण आहार: बच्चों को प्रतिदिन 'सांझा चूल्हा' कार्यक्रम के तहत गर्म पका हुआ भोजन (दलिया, खिचड़ी) और मंगलवार को विशेष आहार दिया जाता है। सहरिया बच्चों के लिए यह भोजन अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि घरों में अक्सर सुबह के समय पर्याप्त पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता।
- वजन एवं कुपोषण स्थिति: कार्यकर्ता द्वारा 'पोषण ट्रैकर' (Poshan Tracker) ऐप पर डेटा दर्ज किया जाता है। 20 उपस्थित बच्चों में से 4 बच्चे 'सैम' (Severe Acute Malnutrition - अति गंभीर कुपोषित) और 5 'मैम' (Moderate) श्रेणी में पाए गए। स्थानीय स्तर पर माताओं में पोषण के प्रति जागरूकता की कमी इसका मुख्य कारण है।
ख. शालेय-पूर्व अनौपचारिक शिक्षा (Preschool Education)
3 से 6 वर्ष के बच्चों को खेल-खेल में सीखने के अवसर दिए जा रहे थे:
- संज्ञानात्मक विकास: स्थानीय परिवेश की वस्तुओं (जैसे- कंकड़, पत्तियाँ) के माध्यम से आकृतियों और गिनती का ज्ञान कराया जा रहा था।
- भाषा एवं गत्यात्मक विकास: स्थानीय बुंदेली और हिंदी मिश्रित बालगीत व कहानियाँ सुनाई गईं। बच्चों को क्ले (मिट्टी) से खिलौने बनाने की गतिविधि कराई गई, जिसमें बच्चों ने अत्यधिक उत्साह दिखाया।
ग. स्वच्छता एवं आदतें
सहायिका द्वारा भोजन से पूर्व साबुन से हाथ धोने का अभ्यास कराया जाता है। हालांकि, कई बच्चों के कपड़े मैले और बिना नहाए हुए थे, जो ग्रामीण स्तर पर परिवारों के अभाव और जल संकट को दर्शाता है।
4. बमोरी के आंगनबाड़ी केंद्रों की प्रमुख समस्याएँ
- कार्यकर्ता पर अतिरिक्त कार्यभार: स्वास्थ्य सर्वे, लाड़ली बहना योजना और निर्वाचन कार्यों में ड्यूटी के कारण कार्यकर्ता शालेय-पूर्व शिक्षा पर पर्याप्त समय नहीं दे पाती हैं।
- सामुदायिक सहभागिता का अभाव: ग्रामीण अभिभावक आंगनबाड़ी को केवल 'खाना मिलने की जगह' मानते हैं, वे इसे शालेय-पूर्व शिक्षा के केंद्र के रूप में नहीं देखते।
- आंतरिक गाँवों में पहुँच की समस्या: बमोरी के कई दूरस्थ मजरों-टोलों में बरसात के मौसम में बच्चों का केंद्र तक पहुँचना कठिन हो जाता है।
5. सुधारात्मक सुझाव एवं निष्कर्ष
बमोरी के आंगनबाड़ी केंद्रों को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए स्थानीय समुदाय (विशेषकर मातृ समितियों) को सक्रिय करना होगा। सहरिया परिवारों को किचन गार्डन (पोषण वाटिका) विकसित करने हेतु बीज और मार्गदर्शन दिया जाना चाहिए। केंद्रों में आधुनिक शिक्षण सामग्री (TLM) की उपलब्धता सुनिश्चित कर बमोरी के नौनिहालों के भविष्य को सुरक्षित किया जा सकता है।